लौट के बुद्धू घर को आए

  अपने ब्लाग 'शकुनाखर' में अंतिम पोस्ट सितम्बर 11 में डाली थी। गम्भीर नेत्र रोग के कारण तब से ब्लाग-जगत से नाता टूट गया। कुछ वर्षों बाद जब दृष्टि में कुछ सुधार हुआ तो पहले फेसबुक और फिर फेसबुक पेज 'शकुनाखर- फेसबुक ' के माध्यम  से अपने विचार व्यक्त करने का प्रयास किया , किन्तु संतुष्टि नहीं हुई। अंततः पुनः ब्लाॅग-जगत की शरण ले रहा हूं और नवम्बर 20 में अपने फेसबुक पेज में डाली गई पोस्ट को पुनः प्रस्तुत कर रहा हूं ।



घिनौना चेहरा

हर बार की तरह इस बार भी एक बार फिर लोकतंत्र का घिनौना चेहरा बिहार चुनाव में  नजर आया। योग्य उम्मीदवार ( वैसे चुनाव में अधिकांश उम्मीदवार अयोग्य होते हैं ) चुने जाने की जगह जाति और धर्म को खुलकर आधार बनाया गया। एक पंथ के अनुयाइयों ने हैदराबाद में सिमटी उस संकीर्ण विचारधारा वाली पार्टी को 5 सीटें दे कर बिहार में उसका आधार बना दिया, जो कहती है 15 मिनट के लिए पुलिस हटा लो, हम हिन्दुओं को देख लेंगे । एक पार्टी को बिहार के हित से कोई लेना देना नहीं, उसे जातीय समीकरण के आधार पर एक व्यक्ति विशेष को मुख्यमंत्री नहीं बनने देना है। यह पार्टी अपने मिशन में सफल तो नहीं हो पाई  लेकिन उस गठबन्धन को कमजोर जरूर कर गई, जिसका वह (केन्द्र में) स्वयं हिस्सा है। एक पार्टी का नेता भले ही भ्रष्ट साबित हो चुका हो और जेल में हो, लेकिन अपनी जाति के आधार पर वह अपना दम-खम दिखाने में सक्षम रही  और अनेक पार्टियों को अपना पिछलग्गू बना सकी।

एक तथ्य यह है कि निर्वाचित 243  विधायकों में  165 दागी हैं।

संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि लोकतंत्र की इस प्रक्रिया (चुनाव) का  घिनौना चेहरा सामने आया ।

प्रतीक्षा है उस दिन की जब केवल जनहित हेतु योग्य व्यक्ति
चुनाव लड़ेंगे और जीतेंगे।

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